प्रेमाख्यानक/ सूफी काव्य की विशेषताएँ
प्रेमाख्यानक काव्य:
प्रेमाख्यानक काव्यधारा निर्गुण काव्य धारा की ही एक
शाखा है। संत काव्य के समानान्तर प्रेमाख्यानक काव्य भी लिखे जा रहे थे। शुरू में
यह समझ बनी थी कि सिर्फ सूफी मतावलंवी कवि प्रेमकाव्य लिख रहें हैं बाद के
अनुसंधान ने यह भ्रम तोड़ा और कई हिन्दू कवियों के प्रेम काव्यों की खोज हुई। लगभग 50 प्रेमाख्यानक कवियों के होने का पता चला है,
जिनमें अधिकांश हिन्दू है।
प्रेमाख्यानक
कवि हिन्दू भी हैं और मुसलमान भी। मुसलमान कवि अधिक सशक्त रचनाकर हैं और उनकी
रचनाएँ ही अधिक चर्चित है। प्रमुख प्रेमाख्यानक कवि और उनके काव्य है- ‘लोरकहा या चंदायन’: मुल्ला दाउद, ‘मधुमालती’: मंझन, ‘मृगावती’ कुतुबन ‘पद्मावत’: जायसी, ‘ज्ञानदीप’: शेख नवी, ‘माधवानल कामकंदला’, ‘आलम’, ‘चित्रावलीः
उसमान, ‘रसरतन‘ पुहकर कवि, ‘लखमसेन पद्मावती कथा’ दामोदर कवि, ‘सत्यवती कथा’: ईश्वरदास, ’छिताई वार्ता’- नारायण दास, ‘हंसावली’ असाइत और ‘रूप मंजरी’: नन्द दास।
प्रेमाख्यानक काव्य की विशेषताएँ
प्रेमाख्यानक
काव्य लोक प्रचलित प्रेम कथाओं को आधार बनाते हैं। कथाऐं ऐतिहासिक,
अर्धऐतिहासिक,
लौकिक या पौराणिक है। ऐतिहासिक कथाओं
में भी कल्पना का इतना संभार है कि उसकी ऐतिहासिकता संदिग्ध हो जाती है। कवियों ने
प्रायः लोक कथा वृत्त में घटना से घटना को जोड़कर ऐसी कथा लड़ी तैयार की है कि उससे
रोमांचक कथासंसार तैयार होता है। कथाओं के काल्पनिक विस्तार की बजह से कहीं कहीं
असंतुलन भी आ गया है।
प्रेमाख्यानक
काव्य के हिन्दू कवि जहाँ बहुदेववादी दिखायी पड़ते हैं वहीं मुसलमान कवि सूफी दर्शन,
वेदान्त दर्शन,
योग दर्शन आदि के तत्वों का उपयोग करते
हैं। इन काव्यों में प्रायः नायिका की कल्पना ब्रह्म रूप में की गयी है। इस ब्रह्म
को पाने के लिए ही जीवात्मा रूपी नायक अपनी सारी विशेषताओं का परिहार कर योगी या
भीखारी बन कर निकलता है। कवियों ने सूफी अद्वैत दर्शन के साथ-साथ भारतीय अद्वैत
दर्शन का भी निरूपण किया है। योग दर्शन के तत्व तो यहाँ भरे परे हैं। पद्मावत में
पद्मावती का हिरामन तोता जब पिंजड़े से उर जाता है तो वह रोती हुयी कहती है,
कि जिस पिंजड़े में 10 दरवाजे हो उसे बिल्ली के हमले से भला कौन बचाएगा। यहाँ
पिंजड़ा देह है, इसी
में 10
दरवाजे हैं और इसमें जो पक्षी रहता है वही आत्मा है। अधिकांश पुस्तकों में भारतीय
दर्शन से जुड़े हुए प्रतीकों का प्रयोग है। चित्रावली में नायक है,
सुजान। सुजान का अर्थ होता है जो अच्छी
तरह जानता हो अर्थात ज्ञानी। ज्ञानी ही प्रेम के नगर में प्रवेश पा सकता है। यह
सुजान शिव का प्रतीक है। चित्रावली और कमलावती में चित्रावली और कमलावती क्रमशः
विद्या और अविद्या के प्रतीक हैं।
पात्रः-
प्रेमाख्यानक काव्य में दो तरह के पात्र है- मानव और मानवेत्तर।
राजकुमार-राजकुमारी, राजा-रानी, अमले कर्मचारी एवं सेना के लोग मानव-पात्र हैं। तोता,
हंस, राक्षस, बेताल, अप्सरा, परी मानवेत्तर पात्र हैं। राजकुमार या राजा ही इन
काव्यों में नायक होते हैं और राजकुमारियाँ नायिका होती है। नायक प्रायः गढ़ में
रहता है जैसे चित्तौरगढ़ और नायिकाएँ प्रायः द्वीप में रहती है जैसे सिंहल द्वीप।
नायक नायिका को प्राप्त करने के लिए राज-पाट, घर-द्वार छोड़ छाड़ कर योगी या भिखारी बनकर निकल पड़ता है।
इन काव्यों में खलनायक तो हैं लेकिन प्रतिनायक की कल्पना नहीं की गयी है। नायक और
नायिका के प्रेम में सबसे बड़ी बाधा है नायिका का पिता। राक्षस और बेताल दुष्ट पात्र
है। हंस या तोता विद्वान पात्र है। अप्सरा या परी सहृद्य हैं। मानवेत्तर पात्रों
की योजना यह संकेत देती है कि रचनाकार ने कथा में अतिप्राकृतिक घटनाओं का समावेश
किया है।
प्रेमः-
प्रेमाव्याणक काव्य प्रेम आधारित है। लेकिन यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि यहाँ प्रेम
साध्य है, वह
तो महज साधन है। सूफी प्रभाव के कारण कुछ कवियों नें जहाँ-तहाँ प्रेम में अलौकिकता
का समावेश किया है। जहाँ प्रेम का सिर्फ लौकिक संदर्भ है,
वहाँ वह आम जीवन अनुभव से जुड़कर हमारे
मन को छूता है।
सुऐ
कहा मन बूझहू राजा। करब पिरीत कठिन है काजा।।
प्रेम-धाव-दुख
जान न कोई। जेहि लागै जानै पै सोई।।
इनके
प्रेम काव्य में भी प्रेम की शुरूआत रूपाकर्षण से होती है। तोता या मैना आदि के
गुणकथन या चित्र दर्शन से नायक के मन में नायिका के प्रति प्रेम पैदा होता है।
नायक और नायिका की मुलाकात प्रायः मंदिर में या फूलवाड़ी में होती है। कवियों नें
नायिकाओं के नख-शिख वर्णन, कला ज्ञान और चातुर्य को चित्रित करने में अपनी पूरी
शक्ति झोंक दी है। ये रूप सौन्दर्य चित्रण मोह में कुछ इस तरह उलझते हैं कि
नायिका और वेश्या के सौन्दर्य के आनुपातिक विवेक का ध्यान नहीं रख पाते। इस दोष से
और तो और जायसी जैसे बड़े कवि भी ग्रस्त हैं। ये पद्मावती का सौन्दर्य वर्णन जिस
उत्साह से करते हैं उसी उत्साह से सिंहल की वेश्याओं का भी। पद्मावती को देखते ही
रत्नसेन का मुर्छित हो जाना आध्यात्मिकता के कारण तो समझ में आता है,
लेकिन झरोखे पर बैठी हुई सिंहल की
वेश्याओं को देखकर आने जाने वालो का मुर्छित हो होकर गिर पड़ना समझ में नहीं आता।
जब बादल की नव-बधू का तिलक हो रहा है, तो ऐसा लगता है कि दर्शन मात्र से ही अनेक युवकों का
प्राणान्त हो जाएगा। यह अतिरंजना चित्रणमोह का ही नतीजा है। कवियों ने सौन्दर्य
चित्रण में ऊहात्माकता (बेहद बढ़ा चढ़ा कर) दिखायी है। जायसी ने पद्मावती के
सौन्दर्य चित्रण और नागमती के विरह वर्णन में ऊहात्मकता से काम लिया है। एक
उदाहरण-
दहि
कोइला भइ कंत सनेहा। तोला माँसु रही नहिं देहा।।
रकत
न रहा बिरह तन गरा। रती रती होइ नैनन्ह ढरा।।
हिन्दू कवियों ने जहाँ प्रेम के संयोग पक्ष को चित्रित
करने में रूचि ली है वहीं मुसलमान कवियों ने विरह पक्ष के चित्रण से रूचि दिखायी
है । उनका विरह असह्य वेदना परक है। विरह के प्रभाव को गहराने के लिए इन कवियों ने
बारहमासे का प्रयोग किया है। विरह में इनकी नायिकाएँ अपना रानीपन भूल जाती हैं। वे
सामान्य नारियों की तरह रोती कलपती है।
अवान्तर
प्रसंगों की योजना:- प्रेमाख्यानक काव्य में कवियों ने पनघट,
बाग, फूलवाड़ी, अश्वशाला, पाकशाला, राजमहल, अमराई, आदि का विस्तार से चित्रण किया है। यह चित्रणकला के
भीतर स्वायत स्वरूप अख्तियार कर लेता है। मौका देखकर कवियों ने वैद्यक,
ज्योतिष, दर्शन आदि का भी विस्तार से वर्णन किया है। इस
ज्ञान-विज्ञान के चित्रण के कारण भी स्वायत्तता आ गयी है। इससे कथात्मक आवेग रह-रह
कर बिखर जाता है। कथा में एकान्विति बन नहीं पाती। कथा के शिल्प के लिहाज से
निश्चय हीं ऐसे वर्णन दोष है, लेकिन कवियों ने इसके लिए सफाई दी है। उनका कहना है,
कि उनका काव्य समाज के सभी वर्गों और
सभी स्तरों के पाठकों के लिए है। जिस समाज में औपचारिक शिक्षा की कोई व्यवस्था न
हो उसमें ऐसे काव्य मनोंरंजन के साथ-साथ ज्ञान अर्जन के भी माघ्यम होते है। दूसरी
बात यह कि आलोचक जिन संदर्भों को अवान्तर मानते हैं वे भी रचनाकार के मूल प्रयोजन
से जुड़़े हुए हैं। ऐसे प्रसंग कथात्मक विक्षेप को द्योतित नहीं करते। वे रचनाकार
के दार्शनिक मंतव्य को प्रकट करतें हैं। पद्मावत मे जायसी ने बहुत विस्तार से
अमराई का वर्णन किया है। शाम होते ही अमराई में बसेरा डालने वाले पक्षियों और उनकी
बोलियों का भी पर्याप्त ब्यौरा दिया है। जैसे-
बसहिं पंखि बोलहिं बहु भाखा। करहिं हुलास देखि
कै साखा।।
भोर
होत बोलहि चुहुचही। बोलहिं पाँडुक
‘‘एकै तूही’’ ।।
व्यापक वर्णन के बाद कवि के मूल संदेश का पता वहाँ चलता
है कि विविध जाति के ये पक्षी अपनी अपनी बोली में एक ही ईश्वर का नाम ले रहें है।
यहाँ कवि का मंतव्य स्पष्ट है; वह धर्मनिर्पेक्ष मूल्यों की प्रतिष्ठा चाहता हैं और
इसके लिए अवान्तर प्रसंग भी माध्यम है।
काव्य
रूपः- प्रेमाख्यानक काव्य न प्रबंध काव्य
है न महाकाव्य। यह कथा काव्य है। प्रबंध काव्य में सर्ग बंधन(प्रकरण/अध्याय) होता
है। इन काव्यों में सर्ग बंधन नहीं है इसलिए ये प्रबंध काव्य नहीं हैं। महाकाव्य
में लोक मंगल की सिद्धि होती है। उसमें चिरंतर मूल्यों की प्रतिष्ठा भी होती है।
ये प्रेणाख्याणक काव्य चूँकि लोकमंगल या चिरंतर मूल्यों की प्रतिष्ठा नहीं करते
इसलिए महाकाव्य भी नहीं हैं। प्रेमख्यानक काव्य प्रेम का काव्य है। जायसी के लिए
पदमावत एक प्रेम कथा है बाकी कुछ नही उनका आग्रह बस यही है –
प्रेम
कथा यहि भाँति बिचारहु’’।
बुझि लेहु जौ
बूझेहु पारेहु।।
आचार्य
शुक्ल पद्मावत में पद्मावती के सति होने के अलावा किसी अन्य महत्त कार्य की योजना
न देखकर गहरी निराशा प्रकट करते है। नायकों में प्रेम के लिए उत्सर्ग देने का भाव
है और नायिकाएँ सति होती है। इन दो खुबियों के अतिरिक्त अन्य कोई गुण नहीं है
जिसके आधार पर इन्हें महाकाव्य कहा जा सके। ये प्रेमाख्याणक काव्य भारतीय
आख्यायिका का विकास लगते हैं। भारतीय आख्यायिकाएँ धारावाही चलते हैं। उनमें सर्ग
बंधन नहीं होता। कथा वैचिन्न्य और मनोंरंजन पर जोड़ होता है। ये सारी विशेषताएँ
प्रेमाख्याणक काव्यों में उपलब्ध है।
शुक्ल
जी ने इन काव्यों को मसनवी प्रबंध शैली का काव्य माना है। सच यह है कि मसनवी
प्रबंध शैली नाम की कोई शैली फारसी में नहीं मिलती है। इसलिए इन्हें मसनवी प्रबंध
काव्य भी नहीं कह सकते हैं। इन काव्यों में लोक कथा वृत्त और ऐतिहासिक कथा वृत्त
की गुंफनशीलता है। लोक कथा वृत्त में अतिप्राकृतिक या दैवी घटनाएँ है। ऐतिहासिक
कथा वृत्त में ऐसी घटनाओं का आभाव है। वहाँ कवि का जोड़ यथार्थ चित्रण पर है। ये
दोनों कथावृत्त लोक और शिष्ठ पाठक वर्ग को ध्यान में रख कर लिख गए हैं। सामान्य
जनता की रूचि यर्थाथ में नहीं अतिप्राकृतिक घटनाओं में है। जबकि शिक्षित पाठक वर्ग
यथार्थपरक घटनाओं में ही रूचि लेता है। लोक कथा और शिष्ट कथा इन कथाओं की दो
बाजूओं की तरह है। ये अलग-अलग दिखती हुई भी एक दूसरे से जुड़ी हुई है।
धर्मनिर्पेक्ष
मूल्यों की प्रतिष्ठा:- इस काव्य परम्परा में सभी मुसलमान कवियों ने हिन्दू घरों
में प्रचलित प्रेम कथाओं को उन्हीं की बोली में कहकर हिन्दूओं और मुसलमानों के बीच
के वैमनस्य को दूर करने का प्रयास किया है। ये प्रेम कथाएँ जिस तरह
लोक कथा वृत्त और शिष्ट कथावृत्त का समन्वय है उसी तरह ये सामान्य वर्ग और कृषक
वर्ग, सामन्ती
संस्कृति और जन संस्कृति का भी समन्वय हैं। रचनाकार का जोड़ विशिष्टता के निषेघ और
सामान्यता के स्वीकार्य पर है। कवियों ने सामान्य जनों कों राजाओं सामन्तों की
जिंदगी का ज्ञान सुलभ कराया है। सामन्तों और राजाओं को जन संस्कृति से परिचित
कराया है। इससे एक समरस मानवीय संस्कृति उभरती है। कोई भी क्षेत्र किसी के लिए
निषिद्ध नहीं हैं। कवि राजाओं को भिखारी या योगी बनाकर किसानों,
खेतों, खलिहानों के बीच ले आता है और किसानों को भी वह राजाओं
की जीवन शैली उनके रहन-सहन ,उनकी रूचियों से परिचित कराता है।
भाषा
और बिम्ब:- प्रेमाख्याणक काव्य प्रायः अवधी भाषा में लिखे गए। कवियों ने प्रतीकों
के साथ-साथ बिम्बों की भी बड़ी सुगढ़ योजना की है। इन बिम्बों से ही इनकी काव्य कला
और रचनात्मक ऊर्जा का पता चलता है।