सूरदास के भ्रमरगीत की काव्य संरचना/शिल्प/स्थापत्य/रचना विधान/काव्य रूपात्मकता

 सूरदास के भ्रमरगीत की काव्य संरचना/शिल्प/स्थापत्य/रचना विधान/काव्य रूपात्मकता



    सूरदास जी भ्रमरगीत में भावसजगता हीं नहीं शिल्पसजगता का भी परिचय देते हैं । सूरदास भ्रमरगीत में अनुभूति और अभिव्यक्ति का संतुलन कहीं बिखरने नहीं देते हैं। कुछ आलोचक इसे प्रगीत मुक्तकों का संग्रह मानते है। कुछ आलोचक इसे खंड काव्य भी मानते है। खंड काव्य के रूप में भी यह किसी की दृष्टि में उपालम्भ काव्य है,  तो किसी की दृष्टि में प्रतीक काव्य। कोई इसे दूत काव्य कहता है तो कोई इसे वाद् विवाद् मूलक काव्य। इस काव्य के बारे में भिन्न-भिन्न राय इसलिए है कि कवि ने विभिन्न काव्य प्रकारों और शिल्प प्रविधियों को आत्मसात कर इसे बहुरूपात्मक बना दिया है।

    भ्रमरगीत के पदों में एक छिन सा कथाक्रम है। उसका एक पद भले हीं तुरन्त बाद के पद से कथात्मक संबंध बनाता हुआ न दिखे लेकिन आगे के किसी न किसी पद से उसकी कथात्मक संगति अवश्य बनती है, इसी कारण भ्रमरगीत के विभिन्न पद कथात्मक कड़ी की तरह दिखते हैं। इससे एक सुसंगत कथा भी उभरती है। कथा की शुरूआत कृष्ण द्वारा उद्धव को संदेश लेकर मथुरा भेजने से होती हे। कृष्ण कहते हैं

सुख-संदेश सुनाय हमारो गोपिन को दुख मेटियो।

    उद्धव गोकुल पहुँचकर पहले नन्द, यशोदा, से कृष्ण का संदेश सुनाते हैं और फिर गोपियों से - यह विषय प्रतिपादन है। गोपियाँ पहले तो संदेश सुनकर चकरा सी जाती है लेकिन अभिप्राय समझकर वे भौंरे के बहाने उद्धव, कृष्ण और मथुराबासियों को तरह-तरह की उलाहना देती हैं। गोपियों की भाव तल्लीनता, रसमयता, एकनिष्ठता देखकर उद्धव पीघल जाते हैं। उन्हें अपने ज्ञान और योग के मिथ्यात्व का आभास होता है फिर वे निर्गुण छोड़ कर सगुन का चेला हो जाते है 'भयो सुगन को चेरो' ! वे मथुरा लौटकर कृष्ण को गोपियों की विरह दशा से परिचित कराते हैं। कृष्ण भी कुरूक्षेत्र के मेले में गोपियों को दर्शन देने का आश्वासन देते है। चूँकि इसमें भूमिका, विषय प्रतिपादन, रस परिपाक और उपसंहार है इसलिए यह एक खंड काव्य है। इसमें चरित्रों का घात प्रतिघात भी है और एक कथात्मक उद्देश्य भी। इस कारण खंड काव्य के रूप में इसकी सफलता असंदिग्ध है।

    भ्रमरगीत प्रगीतात्मक है। प्रगीत में कवि अपनी भावाकुलता लेकर आता है। प्रगीतों में कथा प्रायः नहीं होती उसमें होती है अविरल अनुभूतियाँ। भ्रमरगीत में कवि का अविरल भाव उसकी निजता के साथ प्रकट हुआ है। दूसरी बात यह कि भ्रमरगीत के हर पद में कवि शुरू में ही एक टेक पंक्ति रखता है। इस टेक पंक्ति में ही गीत का सार निच्छेपित होता है। गीत की शेष पंक्तियाँ विभिन्न दृष्टान्तों से टेक पंक्ति के सार को ही सत्यापित करती है। लेकिन हर जगह शेष पंक्ति टेक पंक्ति की व्याख्या ही प्रमाणित नहीं होती। कवि ने कहीं-कहीं विच्छेद पैदाकर दिया है- 'हम तौ कान्ह केलि की भूखी' बाले पद से अन्तिम दो पंक्तियाँ इस टेक पंक्ति के साथ अपना अविछिन्न संबंध प्रदर्शित नहीं करती। इस विचलन या विच्छेप के द्वारा ही सूरदास जी एक पद को दूसरे पद के साथ जोड़ते हैं उनमें कथात्मक संगति बनाते हैं। सूरदास जी ने हर पद को किसी न किसी राग और रागिनी में बाँधा है, इसी कारण उनका भ्रमरगीत सिर्फ विरह का काव्य नहीं है, राग रागिनियों का भी काव्य है।

    भ्रमरगीत में सूरदास जी परम्परा से प्राप्त संवाद शैली की रूढ़ी को वाद-विवाद शैली में बदल देते हैं। यह वाद-विवाद शैली शास्त्रीय बहस की खंडन-मंडन वाली शैली है। वाद-विवाद में उद्धव का संवाद यदि पूर्व पक्ष है, तो गोपियों का संवाद है उत्तर पक्ष। एक वादी है तो अन्य विवादी। वाद-विवाद में उद्धव एक बात बोलकर चुप हो जाते हैं उत्तर में गोपियाँ अनेक संवाद बोलती चली जाती है। उनका अनेक संवाद जहाँ एक ओर उनकी बहुसंख्या को द्योतित करता है वहीं दूसरी ओर उनके अजस्र भाव प्रवाह को भी। उद्धव ज्ञान मार्गी है। उनका बल है तर्क पर और तर्क की मांग है- संक्षिप्तता। इसलिए उद्धव एक संवाद बोलकर चुप हो जाते हैं। गोपियाँ प्रेम विवश है। उनका बल है, कृष्ण में अटूट रिश्ता। भावुकता, विस्तार की मांग करती है इसलिए गोपियाँ अनेक संवाद बोलती चली जाती है। अन्ततः सूरदास जी उद्धव के ज्ञान योग पर गोपियाँ के प्रेम और भक्ति की जीत चित्रित करते है और इस बाद विवाद का निर्णायक अन्त करते हैं। इससे यह काव्य एक सफल बाद-विवाद मूलक काव्य प्रमाणित होता है।

    भ्रमरगीत एक दूत काव्य है। दूत काव्य में दूतत्व का प्रयोजन कुछ भी हो सकता है लेकिन आम तौर  पर प्रेमी-प्रेमिका का मिलन नियोजित करने के प्रयोजन से बंधकर दूतत्व रूढ़ हो गया है। भ्रमरगीत में दूत काव्य के तत्वों का उपयोग तो है लेकिन दूत काव्य की रूढ़ियों का पूर्ण अनुपालन नहीं है। सूरदास जी ने विरह श्रृंगार में भी दूतत्व को अपने ढंग से नियोजित किया है यह ठीक है कि उद्धव गोपियाँ के लिए अपेक्षित संदेश नहीं लाते और न ही उनके लाये संदेश से मिलन आयोजित होता है। लेकिन यह भी तो सही है कि उद्धव के आने पर ही गोपियों की श्याम स्मृति सजग हो जाती है। गोपियाँ कहती हैं

        ऊधो! भली करी तुम आए।

        विधि कुलाल किन्हें कांचे घट ते तुम आनि पकाये।

        ब्रज करि  अँवा योग इंधन करि सूरति आनि सुलगाये।

    उद्धव जब सगुण का चेला बनकर मथुरा पहुँचते हैं तो वे गोपियाँ के दारूण दुःख से कृष्ण को परिचित कराते हैं। कृष्ण उन्हें गोपियाँ को दर्शन देने का आश्वासन देते है। कुरूक्षेत्र के मेले में कृष्ण से गोपियों की भेट होती है। निश्चय हीं लौटे हुए उद्धव का दूतत्व सफल है क्योंकि उन्होंने मिलन प्रायोजित कराया है। इस लिहाज से यह एक सफल दूत काव्य भी है।

    भ्रमरगीत एक सफल उपालम्भ काव्य भी है। जिस तरह दूत काव्य की परम्परा मेद्यदूत से चली, उसी तरह उपालम्भ काव्य की परम्परा अभिज्ञानशाकुंतलम् से चली। ये दोनों परम्पराएँ भ्रमरगीत में आकर पुष्ट हुयी। कृष्ण आश्वासन के बाद भी गोकुल नहीं लौटते। उद्धव से जो संदेश भेजते हैं वह भी अनुकूल नहीं हैं। गोपियाँ भौंरे को माध्यम बनाकर कृष्ण की भोगवादी लोलुपता एवं छलियापन पर उलाहना देती हैं। उनका उपालम्भ सामने वाले को अपमानित करने के लिए नहीं है बल्कि उसे उसकी अपनी गलती का एहसास कराकर, अनुकूल बनाने के लिए हैं। उपालम्भ में हीं गोपियों की वचनवक्रता, विनोद प्रियता और लोकानुभव का परिचय मिलता है। अन्ततः गोपियाँ जिस तरह कृष्ण में अपने लिए करूणा जगाने में सफल हुयी है उससे उनके उपालम्भ की सत्यता सिद्ध होती है।

    भ्रमरगीत एक दुखान्त विरह काव्य है। विरह गोपियों का स्थायी भाव ही नहीं स्वभाव बन गया है। गोपियाँ मानने लगी है कि सुख संयोग में नहीं वियोग में है। वे कहती भी हैं उधो ! बिरहौ प्रेमु करैप्रेम करना तो विरह को आता है। यदि संयोग आत्म विस्मरण का माध्यम है तो विरह है प्रिय के स्मरण का माध्यम। प्रतीक्षा करने, याद करने, पीड़ा को मर्म पर अनुभव करने में जो सुख है वह संयोग में कहाँ। अन्ततः क्षणिक मुलाकात के बाद गोपियों का विरह अंतहीन हो जाता है। इसलिए भ्रमरगीत अन्तहीन विरह का काव्य है।

    भ्रमरगीत प्रतीक काव्य भी है। कृष्ण ब्रह्म हैं, गोपियाँ जीवात्माएँ हैं, गोपियों में भी राधा यदि आत्मा है तो बासुरी ब्रह्म से जीवात्माओं को मिलाने का साधन है। यदि राधा आत्मा हैं तो शेष गोपियाँ हैं उसकी देह। यही माधुर्य या श्रृंगार रस में उद्दीपन की भूमिका निभाती है। उद्धव ज्ञानश्रि अहंकार के प्रतीक हैं। इस अहंकार से बिना पीछा छुड़ाए ब्रह्म की प्राप्ति संभव नहीं। इस भ्रमरगीत में भ्रमर कई अर्थो का बाचक है। इसके सारे अर्थ लाक्षणिक है - कृष्ण, उद्धव, जिसका मति भ्रम हो गया हो, जो दूसरे को भ्रम में डालता हो, प्रेमी या पति और व्यभिचारी। भ्रमरगीत में यह भ्रमर सामंती रस लोलुपता का भी प्रतीक है। यह एक सफल प्रतीक काव्य भी है।  

    

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