कामायनी में मिथक तत्व/कामायनी पुराण का ऐतिहासिकरण या इतिहास का पौराणिकरण

 कामायनी में मिथक तत्व/कामायनी पुराण का ऐतिहासिकरण या इतिहास का पौराणिकरण


    अतिप्राकृतिक घटनाओं, विश्वासों, भावनाओं का ही कलात्मक रूप मिथक है। मिथक आदर्श होता है। मिथक तर्कातीत होता है। मिथक मिथ शब्द से और मिथ मायथोस से बना है जिसका अर्थ है अतर्कय आख्यान। मिथक एक प्राग ऐतिहासिक कथा है जिसमें तार्किक संगति नहीं होती। लेकिन जिसमें प्रकट विश्वास अपना काम करता है। मिथक का ऐतिहासिकरण करना राष्ट्रीय इतिहास की प्राचीनता को द्योतित करने की प्रवृत्ति का परिचायक है तो इतिहास को मिथकीकरण कला की जरूरत है। प्रसाद जी कामायनी में भी मिथक का इतिहासिकरण इसी जरूरत के कारण करते हैं।

मनु आदि मानव है। वे ब्रह्मा के प्रथम पुत्र हैं। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार एक मछली से उन्हें जल प्रलय की सूचना मिली। उस मछली ने ही बताया कि तुम्ही से सृष्टि लीला विकसित होगी। यह मनु प्राग ऐतिहासकि मनु है। लेकिन प्रसाद ने इस आदि मानव मनु में ही स्मृतिकार मनु को समाहित कर दिया है। मिथक से इतिहास को जोड़ने की वजह से ही मनु एक लिजेंडरी, पुरूष बन गए। आधुनिक विज्ञान ने भी जल प्लावन पर ऐतिहासक सत्यता की मुहर लगा दी है। इस जल प्लावित पृथ्वी से हीं पर्वत निकला। कामायनी के मनु पर्वत की हीं छाया में बैठे प्रलय प्रवाह देख रहे हैं। प्रसाद जी यदि मनु को ऐतिहासिक जल प्लावन से जोड़ रहे हैं तो यह मिथक का इतिहासीकरण है। वैदिक सभ्यता याज्ञिक सभ्यता है। यज्ञ का संबंध अग्नि और चुल्हे से है। प्राग ऐतिहासिक युग में अग्नि के आविष्कार ने मानव की कई समस्याएँ हल कर दी। मनु भी आशा सर्ग में पाक यज्ञ करते हैं। प्रसाद की कुशलता इसमें है कि वे यज्ञ की अग्नि ज्वाला को मनु के भीतर काम ज्वाला में रूपानतरित कर दे, यज्ञ से ही मनु के भीतर कर्म और काम दोनों का भाव जगाः

नव हो जगी अनादि वासना मधुर प्राकृतिक भूख समान

        यज्ञ का संबंध जल पलावन के बाद की सभ्यता से है। लेकिन प्रसाद जी ने जल पलावन के तुरंत बाद यज्ञ को रखकर हजारों वर्ष की सभ्यता को मानव के साथ जोड़ दिया है और उसे एक ऐतिहासिक संदर्भ देने की कोशिश की है। यज्ञाग्नि के कामाग्नि में रूपानतरण का ही परिणाम मनु और श्रद्धा के संयोग में दिखायी पड़ता है। ऋग्वेद के श्रद्धा सूक्त में कहा गया है कि श्रद्धा से ही अग्नि उत्पन्न हुयी। कामायनी में मनु पाक यज्ञ करते हैं आस्था के कारण हीं और उससे जो अग्नि पैदा होती है वहीं आगे उन्हें श्रद्धा से जोड़ती है।

        मिथक हर युग के मनुष्य को नयी प्रेरणा देने वाली कथा है। इस मिथक में इतिहास भी घुला हुआ होता है। कामायनी की इड़ा मनु को सरस्वती नदी के किनारे मिलती है। कनिंघम की पुरातात्विक रिपोर्ट से यह प्रमाणित है कि वैदिक युग में दो बड़ी नदियाँ बहती थी- सरस्वती और द्रश्द्वती। बाद में यही सरस्वती देवी के रूप में प्रचलित हुयी। प्रसाद ने कामायनी की इड़ा में नदी और देवी दोनों अर्थों को पिरोया है। प्रसाद जी की इड़ा बौद्धिकता, विज्ञानवाद, कर्म संगठन का प्रतीक है। इस इड़ा को उन्होंने सरस्वती नदी और सारस्वत प्रदेश से जोड़कर और ज्ञान की देवी सरस्वती से जोड़कर यहाँ मिथक का इतिहासीकरण किया है। दूसरी ओर ऐतिहासिक नदी सरस्वती से इड़ा कोे जोड़कर इतिहास का मिथकीकरण किया है।

        प्रसाद जी ने प्राक ऐतिहासिक हिमालय से लेकर मध्यकालिन हिमालय तक की कथा कामायनी में समाहित की है। मिथकीय भूगोल के साथ मिथकीय इतिहास को योजित करने के कारण ही हिमालय, सरस्वती, त्रिपुर प्रदेश, सिंधु आदि प्रतीक हो गए है।

        मिथक चिरन्तर मानवीय अर्थ सम्प्रेषित करता है। मिथक की घटनाओं और चरित्रों का भी चिरन्तर मानवीय महत्व होता है। आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी ने कामायनीके आद्य प्रारूपात्मक बिम्बों और प्रतीकों को खोलते हुए कहा कि जो मनु और कामयनी है वहीं  आधुनिक पुरूष और नारी भी हैं। यही नहीं शास्वत पुरूषत्व और नारीत्व भी वही है। एक की साधना सबकी साधना हो जाती है। कामायनी की कथा भी इसी धारणा और विश्वास के कारण मानव नियति की कथा हो गयी है। इसमें रचनाकार ने अब तक की मानवीय सत्यता को मनु की कथा में ही समाहित कर दिया है और इसलिए कि मिथक के कारण एक की कथा हीं सबकी कथा हो जाती है। मनु और श्रद्धा चिंता एवं आशा सर्ग में वन्य जीवन जी रहे हैं। इससे आदिम वन्य संस्कृति की सूचना मिलती है। मनु और श्रद्धा, श्रद्धा सर्ग में परस्पर मिलते हैं वे एक गुफा में अपनी गिरहस्थी बसाते हैं। श्रद्धा गुफा के द्वार पर शस्य वपन करती है। यह कृषि संस्कृति का संकेत है। अपनी संभावित पुत्र के लिए श्रद्धा ही वेतसी लता का झुला तैयार करती है। यह कुटीर उद्योग संस्कृति है। कुटीर उद्योग संस्कृति कृषि संस्कृति पर ही आधारित होती है। सारस्वत प्रदेश में मनु और इड़ा मिलकर औद्योगिक सभ्यता निर्मित करते हैं। बड़े-बड़े यंत्रों से जो संस्कृति निर्मित हुयी उससे पूंजीवाद का विकास हुआ। वर्गों के बीच खाई बनी। अपनी अपनी जगह पर वर्गों की खाई पाटने के लिए वर्गहीन समाज का निर्माण करते हैं। इड़ा का वर्गहीन समाज सारस्वत प्रदेश में एक कौटुम्बिक समाज के रूप में उभरता है और मनु का वर्गहीन समाज समरसता मूलक समाज के रूप में। इन दोनों की अलग-अलग यह कोशिश साम्यवादी संस्कृति का आभास देती है। मानव के विकास के चारों चरण कामायनी में समाहित है।कामायनी के मनु मननशीलता के प्रतीक है। श्रद्धा हार्दिकता का और इड़ा बौद्धिकता का प्रतीक है। इन तीनों के सामंजस्य से ही व्यक्ति पूर्ण मानवत्व को प्राप्त कर सकता है। कैलाश पर त्रिपुर प्रदेश है यहाँ तीन अलग-अलग जाज्वल्यमान बिन्दु दिखाई पड़ते है। ये बिन्दु श्रद्धा के मुस्कान से एकीकृत हो जाते है। यह एकीकरण इच्छा, ज्ञान और क्रिया का एकीकरण है। यह आदर्श स्थिति है जो हर युग के मनुष्य के लिए काम्य है।  चूंकि मनुष्य मिथक में अपने वर्तमान और भविष्य के लिए दिशा निर्देशक तत्व ढूँढ़ता है इसलिए कह सकते हैं कि इतिहास का मिथकीकरण कला को आदर्शपरक बनाने की जरूरत का परिणाम है।

        कामायनी में मिथक के प्रयोग के कारण ही प्रसाद ने पौराणिक कथा को आधुनिक संदर्भ दिया। देव सभ्यता हमारी उत्तरकालिन मध्य युगीन सभ्यता ही है। देव सभ्यता की तरह ही उत्तरकालिन सामान्ती सभ्यता स्थिर, अगतिशील और अपरिवर्तनशील सभ्यता है। अतिशय वासना के कारण ही इस सभ्यता का नाश हुआः

भरी वासना सरिता का वह कैसा था मदमत् प्रवाह

प्रलय जलधि में संगम जिसका देख हृदय का उठा कराह

X                 X                X      

        विरल वासना के प्रतिनिधि सब मुरझाए चले गए

काम की शाप वाणी, लज्जा से श्रद्धा का संभाष, हिमालय पर नरेश का दर्शन, आकुलिऔर किरात की कथा मिथकीय है। लेकिन इस सब के जरिए रचनाकार ने आधुनिक मानव के लिए नैतिक मानवीय संदेश दिए है। मनु द्वारा पूंजीवादी सभ्यता खड़ा कर शोषण दमन करना देवता और शिव को भी क्रूध करता है।

        अंतरिक्ष में हुआ रूद्र हुंकार भयानक हलचल थी

        मनु को लगा कि उनका अशिवत्व ही परेशानियों का कारण है। अशिवत्व का अर्थ है लोक कल्याण का तिरोभाव। कैलाश पर नटेश के दर्शन भी उन्हें शिवत्व की ओर मोड़ने के लिए है। मनु जब दूसरों के सुख में अपना सुख देखने लगते हैं तो वे व्यवहारिक स्तर पर उस शिवत्व को प्राप्त कर लेते हैं।

        देखो कि यहाँ कोई भी नहीं परायाशिवत्व से उत्पन्न समरसतावादी दृष्टि है। यहाँ रचनाकार ने मिथक के जरिए मानव मात्र के सामाजिक कल्याण का संदेश दिया है।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post