अंधेर नगरी के शिल्प / लोक नाट्य तत्व के प्रभाव।

 अंधेर नगरी के शिल्प / लोक नाट्य तत्व के प्रभाव।


    शिल्प रचना के कथन को संरचनात्मक अभिव्यक्ति देता है। शिल्प रचना की महज आकृति नहीं है वह आकार देने वाली प्रविधि भी है। किसी भी रचना का शिल्प उसके कथन के भीतर से फूटता है और इसी कारण हर विधा ही नहीं, हर रचना का शिल्प अलग-अलग होता है।

    हिन्दी रंगमंच को गरिमा भारतेन्दु के कृतित्व से मिली। व्यवहारिकता और उपयोगिता के दबाव के कारण ही उनका शिल्प भी लचीला है। अंधेर नगरी तो एक कसी हुयी शिल्प संरचना का नाटक है। इसका लचीला शिल्प लचीला इसलिए है कि इसमें अनेक नाट्य रूपों और तत्वों की संभावनाएँ जगाने की क्षमता है। अंधेर नगरी की कथा लोकपरम्परा और लोक वार्त्ता से ली गयी है। गीत और संवाद भी जनता के बीच से सीधे उठाए गए है। इसमें लोक शैली का खुलापन है इसी कारण यह किसी बंधे बधाएं सांचे का मुहताज नहीं रहा है। नाटक में गीत संगीत के तत्वों की भरमार है, जो इसे लोकनाटक के आस-पास खड़ा करती है। गीत संगीत लोक नाटकों की जान है। अंधेर नगरी के गीत नाटक प्रसंगानुकूल तो है हीं वे स्वतंत्र कविता जैसा महत्व भी रखते हैं। गीत संगीत का नियोजन सुरूचिपूर्ण है। इसमें कहीं फुहड़पन नहीं आता। भारतेन्दु गीतों को देश दशा के साथ जोड़कर इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि ये गीत हर युग के प्रेक्षक और पाठक के आकर्षण बन गए। लोक नाट्य तत्वों के प्रति उनकी निष्ठा का हीं प्रमाण है कि उन्होंने इस नाटक की कथा नीति कथा के अनुरूप रखी है। महंत के आदि अंत के उपदेश भी नीति परक है। चौपट राजा के फांसी चढ़ने से भी शिक्षा मिलती है।

            अंधेरनगरी में परिहास उसके शिल्प का अभिन्न अंग है। इस प्रकार अंधेर नगरीप्रहसन माना जाता है लेकिन भारतेन्दु जी ने इसे भी भारतीय नाट्य शास्त्र में वर्णित प्रहसन की विशेषताओं के अनुरूप नहीं रचा। भारतेन्दु स्वयं लिखते हैं कि यद्यपि प्रहसन में एक हीं अंक होता है लेकिन अब अनेक दृश्य दिये बिना नहीं लिखे जाते हैं।’’ भारतीय नाट्य शास्त्र के अनुरूप उन्होंने इस नाटक में एक अंक नहीं रखा है बल्कि इसे छः अंकों में बाँटकर उन्होंने रूढ़ नाट्य रूप में विचलन पैदा कर दिया है।

इस नाटक के लचीले शिल्प की वजह से ही कोई इसपर नीति कथा का प्रभाव देखता है तो कोई लोक वार्ता का। कोई इसे प्रहसन मानता है तो कोई असंगत नाटक। कोई इसे नौटंकी से प्रभावित मानता है तो कोई लोक नाटक से। इस छोटे से नाटक में अनेक नाट्य रूपों की संभावना इसके नाट्य शिल्प के लचीलेपन को प्रमाणित करती है।

            भारतेन्दु के लिए यह स्वभाविक था कि वे लोक कथा के रूप में प्रचलित अंधेर नगरी के नाट्य विन्यास में लोक नाट्य तत्वों का उपयोग करते। लोक नाटक पद्यात्मक होता है इसमें गद्य का प्रयोग सिर्फ हास्य व्यंग के लिए किया जाता है। लोक नाटक का हसोड़ पात्र जिसे संस्कृत नाटक में विदुषक कहा जाता है, इस गद्यात्मक अंश का प्रयोग हास्य उत्पन्न के लिए करता है। भारतेन्दु जी अंधेर नगरी में अधिक गद्यात्मक संवाद रखते है निश्चय हीं यह लोक नाटक की शर्त्त के अनुकूल नहीं है लेकिन जिस तरह लोक नाटक में गीत संगीत का बाहुल्य होता है इसी तरह अंधेर नगरी में भी गीत संगीत की पुरी गुंजाइस है। लोक नाटक में मंच स्थापत्य आवश्यक नहीं होता। अंधेर नगरी एक तरफ तो भारी भारकम सेट पर भी खेली गयी है और दूसरी तरफ नुक्कड़ रंगमंच पर भी। इसके असंख्य नुक्कड़ रंगमंचीय प्रर्दशन पद सिद्ध करते हैं कि इस नाटक के लिए मंच व्यवस्था बिल्कुल अपेक्षित नहीं। यह लोक नाटक का प्रभाव है।

लोक नाटक में अति प्राकृतिक घटनाएँ होती हैं। अंधेर नगरी में गोवर्धन दास की पुकार पर अंधेर नगरी कब का छोड़ चुका महन्त तुरंत हाजिर हो जाता है। उसकी उपस्थिति अतिप्राकृतिक कथा तत्व के समावेश का परिणाम है। लेकिन इसके बावजूद नाटक कहीं अयथार्थपरक नहीं होता यह भारतेन्दु की अपनी मौलिक सूझबुझ का नतीजा है। लोक नाटक की तरह अंधेर - नगरी में पात्र एकसाथ मंच पर आकर एकसाथ ही मंच से जा सकते हैं। लोक नाटक में कथा वाचक भी बोलता है और पात्र भी। अंधेर नगरी में भारतेन्दु जी ने कथावाचक या सूत्रधार की योजना नहीं की है। इस विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतेन्दु जी लोक नाट्य तत्वों को न तो गले लगाते हैं और न ही उनकी और पीठ करके खड़ा होते हैं।

            अंधेर नगरी का बाजार दृश्य शिल्प की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। बाजार दृश्य में पात्र, भाषा, वेशभूषा, पेशा के आधार पर भारतेन्दु ने विविधता बनाए रखी है। रंगमंच पर विविधता से ही दृश्य परिवर्तन और दृश्य परिवर्तन से ही नाटकीयता की संभावना बनती है। बाजार दृश्य में पात्रों का क्रम है - कबाब  वाला, घासी राम, नरंगी वाली, हलवाई, कुंजड़िन, मुगल, पाचक वाला, मछली वाली, जात वाला, वनिया। प्रारंभ में और मध्य में तथा अन्त में दो पुरूष पात्र लगातार आते हैं, अन्यथा क्रम है एक पुरूष एक स्त्री। इससे विविधता आती है। पात्रों की भाषा स्थानीय रंगत के साथ उभरती है इससे भी एकरसता फटक नहीं पाती। घासी राम, पाचक वाला और मछली वाली के संवाद पद्यात्मक हैं। कबाब वाला, नारंगी वाली, कुंजड़िन, मुगल और जातवाला के संवाद गद्यात्मक है। इस गद्यात्मक संवादों में भी आनुप्रासिकता के साथ पैदा की गयी है जैसे खाए सो होठ चाटे न खाए सो जीभ काटे’, मैं तो पिय के रंग न रंगी मैं तो मूली लेकर संगी’, ‘मोएम दार कचौड़ी कचाका हलुआ नरम चमाका’, आदि पद्यात्मक संवाद तत्व के जरिए अधिक आकर्षक प्रस्तुति की संभावना रखते हैं। गीत के जरिए रंगमंच अधिक अभिनेय बनता है। जाहिर है कि भारतेन्दु ने लिंग भेद, भाषा भेद, पेशा भेद के जरिए वैविध्य बनाए रखा है।

            राजसभा का दृश्य बाजार दृश्य से बिल्कुल भिन्न है। यहाँ संदर्भ एक ही स्थान से जुड़ा है राजा, मंत्री और सेवक पुरे दृश्य में मौजूद हैं लेकिन सेवक द्वारा बार बार प्याले में शराब डालने और राजा द्वारा पीने से एक रसता टुटती है। फिर वादियों प्रतिवादियों के आगमन से भी दृश्य में गतिशीलता आती है। राजा के उलूल-जूलूल संवाद एवं उसकी न्याय प्रक्रिया के कारण हीं दर्शकों में उत्सुकता बनी रहती है कि देखे कि राजा इस बार बकड़ी से बड़की कहता है या लड़की या वह सजा किसे देने जा रहा है। राजसभा के दृश्य में राजा की भाषा में एक निर्भय अल्हड़ता है जबकि वादियों प्रतिवादियों की भाषा में सतर्कता और चालाकी।

            नाटक का आदि और अन्त भी शिल्प की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। नाटक का प्रारंभ एक भजन से होता है राम भजो भजो राम भजो भाई। संस्कृत नाटक की शुरूआत मंगलाचरण से होती है। लोक नाटक का प्रारंभ बंदना से होता है। पारसी रंगमंच पर कोरस में की गयी प्रार्थना से नाटक शुरू होता है। भारतेन्दु काल में अव्यावसायिक रंगमंच पर नाटक की शुरूआत गीत संगीत से होती थी। भारतेन्दु जी ने प्रचलित नाट्य रूपों की रूढ़ियों को न अपनाते हुए भी भजन के द्वारा नाटक की शुरूआत कर परम्परा का निर्वाह किया है। भजन के कारण नाटक में स्वाभाविता आयी है। नाटक का अंत भरत वाक्य से नहीं किया गया बल्कि एक नीति परक दोहे से किया गया। यह दोहा उपदेशात्मक है और भरत वाक्य जैसा हीं प्रभाव छोड़ता है।

                        जहाँ न धर्म न बुद्धि नहिं, नीति न सुजन समाज ।

                        ते    ऐसेहि   आपुहि  नसैं,  जैसे  चौपट  राज।।

            अंधेर नगरी की शिल्प योजना बिम्ब प्रतिबिम्ब भाव के कारण अधिक प्रभावोत्पादक हो गयी है। राजसभा का दृश्य यदि बिम्ब है तो बाजार दृश्य है उसका प्रतिबिम्ब। राजसभा के राजा मंत्री कोतवाल में यदि बैकुंठ जाने का लोभ है तो बाजार दृश्य के गोवरधनदास में मिठाई खाने का लोभ। राजसभा की न्याय व्यवस्था समता मूलक है क्योंकि वह अपराधी और निरापराधी में भेद नहीं मानती। अपराध कोई करता है और सजा कोई पाता है। बाजार दृश्य में भी समतावाद है क्योंकि वहाँ टके शेर भाजी टके सेर खाजा है। अंधेर नगरी के प्रमुख दृश्यों में असमब्द्धता है जैसे बाजार दृश्य, राजसभा दृश्य और श्मशान दृश्य की कथा और पात्र एक दूसरे से सम्बद्ध नहीं हैं। लेकिन रचनाकार ने पूरे नाटक को एक लक्ष्योन्मुखी बनाकर एकसूत्रता पैदा कर दी है।

            अंधेर नगरी नाटक के पहले दृश्य में सिर्फ तीन पात्र है। दूसरे दृश्य में पात्रों की संख्या बेहिसाब बढ़ जाती है। दूसरा दृश्य बाजार दृश्य है यदि ग्राहकों को भी रंगमंच पर उतारा जाए तो पात्र असंख्य हो जाते हैं। तीसरे दृश्य में पात्रों की लिहाज से रंगमंच सिकुड़ जाता है - महंत और दो चेले। चौथा दृश्य राज्यसभा दृश्य है इसमें राजा मंत्री सेवक के साथ-साथ वादी प्रतिवादी आते जाते रहते हैं। यहाँ भी पात्रों की बहुलता है। पाँचवे दृश्य में गोबर्धनदास मिठाई चाभता हुआ मटक-मटक कर अंधेर नगरी गीत गा रहा है। वह अकेला है लेकिन वह आनंद के परम क्षण में दो चार प्यादों द्वारा पकड़ लिया जाता है इसलिए इस दृश्य में पात्रों की संख्या पाँच हो गयी है। अंतिम दृश्य श्मशान दृश्य है। इन पाँचों के अलावा महंत, राजा, कोतवाल, मंत्री आदि भी आ गए हैं। जब राजा अपने विशेषाधिकार का प्रयोग कर स्वयं फांसी पर चढ़ जाता है तो जनता उसे टिकठी पर चढ़ा देती है। जनता की उपस्थिति के कारण इस दृश्य में भी पात्रों की संख्या असंख्य हो जाती है। नाटककार ने बाजार दृश्य, राजसभा दृश्य और श्मशान दृश्य को रंगमंच पर समूहन या कैरोग्राफी के अनुरूप रखने की संभावना पैदा की है।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post